संदेश

प्रार्थना से कर्म तक: समाज और बच्चों का भविष्य

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प्रार्थना और सपना: एक ईश्वरीय संवाद...        एक शीतकालीन रात्रि में चारों ओर गहरा सन्नाटा,  स्थिरता और मौन का साम्राज्य फैला हुआ था। किन्तु एक व्यक्ति, जो समाज का सामान्य-सा सदस्य था, अपने घर के छोटे से कक्ष में बेचैन होकर करवटें बदल रहा था। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसकी आत्मा भीतर ही भीतर किसी उत्तर की खोज में भटक रही थी।            वह सोच रहा था कि "आखिर कब उसकी प्रार्थनाएँ पूरी होंगी। क्योंकि वह अपने देश की दिन पर दिन बढ़ती अराजक व्यक्स्था से दुखी था।       वह प्रतिदिन ईश्वर से विनती करता कि हे ईश्वर !इस धरती पर एक ऐसा बालक जन्म ले, जो मेरे देश को गौरव प्रदान करे, जो अराजकता, अज्ञान और अन्याय के अंधकार को चीरकर सूर्य की तरह इस देश को विश्व में सर्वोच्च पायदान पर प्रतिष्ठित करे। परंतु अभी तक उसको कहीं भी ऐसा बालक नहीं दिखा जो समाज ओर देश को नया मजबूत धरातल दे सके।"       धीरे-धीरे उसकी पलकों पर नींद का बोझ उतर आया। उसी पल एक अद्भुत स्वप्न ने उसकी चेतना को अपने वश में कर लिया।  स्वप्...

इमर्जेंसी नम्बर, आपकी असली कमाई क्या है ?

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इमर्जेंसी नम्बर - जीवन की असली पूँजी इस लेख के पाठकों से पहला प्रश्न ये है कि आपकी असली कमाई क्या है ? लेखक का विनम्र निवेदन है कि इस लेख को आगे पढ़ने से पहले, उपरोक्त प्रश्न का उत्तर एक पहेली की भांति बड़ी गंभीरता, साहस और ईमानदारी  से अपने आप को दें... अपने उत्तर पर मनन करें... फिर आगे लेख पढ़ें। आज के इस भाग-दौड़ भरे जीवन में जरा रुक कर सोचिए कि आपकी असली कमाई क्या है, क्या आपकी जिंदगी में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे आप आधी रात को, बिना एक पल सोचे, फोन लगा सकें ? जिसे आप कह सकें, "यार, मैं फँस गया हूँ, मदद चाहिए" और वह बिना सवाल पूछे, बिना हिसाब-किताब लगाए, बस आपके लिए निकल पड़े ? और दूसरा, इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या आप खुद किसी के लिए ऐसे व्यक्ति हैं ? क्या किसी की फोनबुक में आपका नाम उस "इमर्जेंसी नम्बर" के तौर पर सेव है ? अगर इन दोनों सवालों का जवाब 'हाँ' है, तो यकीन मानिए, आप इस दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। यह लेख बैंक बैलेंस की नहीं, दिल के बैलेंस की बात करता है । उस पूँजी की, जो न लॉकर में रखी जाती है, न सोशल मीडिया पर दिखाई जा...

शिक्षा से पहले सभ्यता

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शिक्षित होने से पहले सभ्य होना आवश्यक है (एक दृष्टिकोण)       आज का युग ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और प्रगति का युग कहा जाता है। हर ओर डिग्रियों की दौड़ है, बच्चों से लेकर युवाओं तक हर कोई केवल इस प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ है कि कौन अधिक अंक लाता है, किसे बेहतर संस्थान से डिग्री मिलती है, कौन ऊँचे वेतन वाली नौकरी पाता है।       लेकिन इस आपाधापी में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छूट जाता है कि क्या केवल शिक्षित होना ही पर्याप्त है, या सभ्य होना, उससे कहीं अधिक अनिवार्य है ? निःसंदेह सभ्यता, सर्वोपरि है और इसका आधार, बचपन की परिवरिश और स्कूली शिक्षा के अनुसार बनती है।      क्योंकि, हर इंसान के बचपन की प्रारंभिक शिक्षा का आधार अपने परिवार के बुजुर्गों के सानिध्य से बनना शुरू होता है जो आगे चलकर स्कूली शिक्षा प्राप्त कर, नैतिकता के पाठ के साथ वह अपनी डिग्री आदि लेकर समाज के सामने आता है। शिक्षा और सभ्यता में अंतर की सूक्ष्म रेखा      शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, इंसान को इंसान बनाना, उसके ...

जो दिखता है वही बिकता है , लेकिन टिकने के लिए क्या चाहिए..?

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जो दिखता है, वही बिकता है... लेकिन क्या इतना ही काफी है ? दिखना, बिकना और टिकना .. वैश्विक युग में सच्चाई और मूल्यों का शाश्वत सिद्धांत बचपन से हम सुनते आए हैं, “जो दिखता है, वही बिकता है।” आज के डिजिटल युग में यह कहावत और भी प्रासंगिक हो गई है। सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स, वैश्विक ब्रांडिंग और एटेंशन इकोनॉमी ने दुनिया को एक मंच बना दिया है, जहाँ हर व्यक्ति, विचार या उत्पाद को खुद को प्रदर्शित करना पड़ता है। अगर आप दिख नहीं रहे, तो मानो आप हैं ही नहीं। लेकिन क्या केवल दिखना और बिकना ही सफलता की अंतिम मंजिल है? या फिर असली चुनौती “टिकना” है, यानी दीर्घकाल तक अपनी जगह बनाए रखना ? आज पूरी दुनिया में लाखों युवा, क्रिएटर्स, उद्यमी और विचारक हर रोज़ अपनी छवि गढ़ने में जुटे हैं। वायरल होने के सपने देखते हैं। शुरुआत में सफलता मिलती भी है, फॉलोअर्स बढ़ते हैं, ध्यान खींचता है, अवसर आते हैं । लेकिन कुछ समय बाद कई गुमनाम हो जाते हैं। क्यों ? क्योंकि उन्होंने केवल पैकेजिंग बेची, प्रोडक्ट नहीं। उन्होंने दिखाया और बिका, लेकिन टिक नहीं सके। यह लेख ठीक उसी गहन विचार को वैश्विक परिप्रेक...