एक नया गुप्तरोग...मनोरोग
मनोरोग, एक नया गुप्तरोग... जाने अनजाने परिवार और समाज की खामोशी पूर्व में जब ‘गुप्तरोग’ की बात होती थी तब उसे यौन रोगों से जोड़कर देखा और समझा जाता था। क्योंकि यौन रोगों पर लोग आपस में,घर हो या बाहर, चर्चा नहीं करते थे। किंतु आज स्थिति बिलकुल विपरीत है। आज समाज में "शिक्षा के प्रसार" से लोग अपने यौन रोगों से संबंधित बीमारियों के प्रति सजग ही नहीं, बल्कि मुखर हो चले हैं और हर तरह की चर्चा में भी खुल कर भाग लेते हैं। सुखद पहलू यह है कि अब चिकित्सक से सलाह और इलाज कराने में उन्हें कोई अलग सा महसूस नहीं होता है। इसलिए वह अब "गुप्तरोग" के रूप में नहीं, बल्कि "यौन रोग" की परिभाषा में स्पष्ट हो चला है। "गुप्तरोग" की परिभाषा में "मनोरोग" का कब्जा, "मनोरोग', एक "गुप्तरोग" क्यों है..? क्योंकि इस रोग के विषय में जानकारी हो जाने के बाद भी इसे समान्य बीमारी ना मान कर, इस पर चुप्पी साध जाते हैं, छुपाते हैं। इसका स्पष्ट असर नज़र नहीं आता, लेकिन जड़ें पूरी व्यवस्था को खोखला कर देती हैं...