संदेश

एक नया गुप्तरोग...मनोरोग

चित्र
मनोरोग, एक नया गुप्तरोग... जाने अनजाने परिवार और समाज की खामोशी        पूर्व में जब ‘गुप्तरोग’ की बात होती थी तब उसे यौन रोगों से जोड़कर देखा और समझा जाता था। क्योंकि यौन रोगों पर लोग आपस में,घर हो या बाहर, चर्चा नहीं करते थे।        किंतु आज स्थिति बिलकुल विपरीत है। आज समाज में "शिक्षा के प्रसार" से लोग अपने यौन रोगों से संबंधित बीमारियों के प्रति सजग ही नहीं, बल्कि मुखर हो चले हैं और हर तरह की चर्चा में भी खुल कर भाग लेते हैं।         सुखद पहलू यह है कि अब चिकित्सक से सलाह और इलाज कराने में उन्हें कोई अलग सा महसूस नहीं होता है। इसलिए वह अब "गुप्तरोग" के रूप में नहीं, बल्कि "यौन रोग" की परिभाषा में स्पष्ट हो चला है।  "गुप्तरोग" की परिभाषा में "मनोरोग" का कब्जा,  "मनोरोग', एक "गुप्तरोग" क्यों है..?      क्योंकि इस रोग के विषय में जानकारी हो जाने के बाद भी इसे समान्य बीमारी ना मान कर, इस पर चुप्पी साध जाते हैं, छुपाते हैं। इसका स्पष्ट असर नज़र नहीं आता, लेकिन जड़ें पूरी व्यवस्था को खोखला कर देती हैं...

आम आदमी को ईश्वर संदेश

चित्र
  प्रार्थना और सपना – एक स्वचिंतन            रात के तीसरे पहर, जब सारा संसार निद्रा में लीन था, एक रहस्यमयी "शीतलता" मुझे जगाने लगी। नींद और जागरण के उस धुंधले क्षण में, एक दिव्य प्रकाश झलका... और उसी में प्रकट हुआ एक स्वप्न... ईश्वर का सन्देश, जो मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर गया। "हे मानव!" एक गूंजती हुई दिव्य वाणी मेरे अंतर्मन में प्रतिध्वनित हुई.... "तू प्रतिदिन मुझसे प्रार्थना करता है,... एक ऐसे तेजस्वी बालक की याचना करता है, जो तेरे देश को गौरव की ऊँचाइयों तक ले जाए। परंतु सुन, हे मानव! मैं तो हर दिन तेरे समाज में एक 'सूर्यपुत्र' भेजता हूँ... ऐसा बालक जो ऊर्जा, संभावनाओं और दिव्य प्रतिभा से ओतप्रोत होता है... किन्तु तेरा समाज उसे बचा नहीं पाता।" मैं स्तब्ध था। वाणी पुनः गूंजी.... "हे मानव! उस बालक के लिए तेरा 'समाज' ही वह प्रथम परीक्षा है, जहाँ वह बालक असफल हो जाता है..." "शैशव काल में उसे भूख और उपेक्षा का स्वाद चखना पड़ता है..." "बाल्यकाल में उसे शिक्षा के स्थान पर अराजकता मिलती है..." "किशोर हो...

माता-पिता का सम्मान क्यों जरूरी है? | बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी

चित्र
साथ चलती उम्र की कहानी ... (बुजुर्ग माता-पिता पार्क में बैठे हुए – सम्मान और अपनापन की तलाश में) आज के समय में बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान और उनकी देखभाल केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और मानवीय मूल्यों का आधार है। यह लेख परिवार, समाज और रिश्तों की सच्चाई को उजागर करता है। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय बन गया है, माता-पिता वो दीवार है जो कभी नहीं गिरती, लेकिन जिसे हम भूल जाते हैं। ध्यान रखे कि जब कोई शिशु अपनी माँ की गोद में पहली बार आँखें खोलता है, तो दुनिया का सबसे पहला स्पर्श उसकी माँ की उँगलियों का होता है। वो नरम, गर्म, और बिना किसी शर्त का स्पर्श।  पिता, अपना हाथ उसकी पीठ पर रखकर उसे सहारा देता है वो सहारा जो जीवन भर चलता है। माँ-पिता उन दीवारों की तरह होते हैं जो तूफान में भी बच्चों को ढककर रखते हैं। कोई शोर और कोई आँधी उन्हें कभी हिला नहीं पाती। लेकिन... समय नाम का वो चोर, धीरे-धीरे सब बदल देता है। बचपन की यादें कितनी मीठी होती हैं, और कितनी कड़वी भी। रात के दो बजे माँ जाग रही है। बच्चे को बुखार चढ़ा हुआ है। माथे पर ठंडी पट्टी रखती हुई वो खुद थक चुकी है, लेकि...

वृद्धावस्था की नई परिभाषा: संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सहारा

चित्र
                 वृद्धावस्था की नई परिभाषा...       संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सच्चा सहारा   तेजी से बदलते समय, सामाजिक संरचनाओं और पारिवारिक व्यवस्थाओं ने वृद्धावस्था की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब माना जाता था कि जितनी अधिक संचित संपत्ति होगी, उतना ही बुढ़ापा सुरक्षित होगा।         माता-पिता के लिए संतानें सबसे बड़ी ढाल और सहारा थीं, क्योंकि भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ संपत्ति की सुरक्षा और हिस्सेदारी की भावना उन्हें माता-पिता की देखभाल के लिए प्रेरित करती थी।      लेकिन बदलते दौर ने इस सोच की सीमाओं को धराशाई कर दिया है। आज स्पष्ट है कि संपत्ति कभी भी रिश्तों को स्थायी रूप से जोड़कर नहीं रख सकती। वास्तविक सहारा धन नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद, संबंध और आपसी सम्मान हैं। बदलती सामाजिक तस्वीर      भारत की पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली ने सदियों तक बुजुर्गों को सहारा दिया। दादा-दादी, पोते-पोतियों के साथ रहते थे, घर में निर्णय का अधिकार उनके पास...