"संयुक्त परिवार: एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था"
संयुक्त परिवार ...एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था वर्तमान समय में युवा पीढ़ी में इसकी प्रासंगिकता और पुनर्स्थापन की संभावनाएँ... भारतीय समाज की नींव सदियों से परिवार पर आधारित रही है। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र है। विशेषकर संयुक्त परिवार व्यवस्था. .. जिसने भारतीय समाज को एकजुट रखा। इसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं, जिम्मेदारियाँ साझा करती हैं और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का सहारा बनती हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था सही मायने में सामाजिक ताना-बाना का आधार है लेकिन आधुनिकता, शहरीकरण और भौतिकतावादी प्रचार ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया। आज के समय में जब लोगों में मानसिक तनाव, अकेलापन और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, संयुक्त परिवार का महत्व और भी बढ़ जाता है। हमारी पिछली पीढ़ी इस व्यवस्था के महत्व को भली भांति बात समझती थी। किंतु वर्तमान पीढ़ी इस व्यवस्था के प्रति उदासीन दिखती है। जबकि आज की युवा पीढ़ी के लिए संयुक्त...